इस चरखे से बिजली बुनी जाती है

हिमांशु शेखर

 

 

 

इस चरखे को ई-चरखा का नाम दिया गया है। इसे बनाया है एक गांधीवादी कार्यकर्ता एकंबर नाथ ने। जब इस चरखे को दो घंटे चलाया जाता है तो इससे एक विशेष प्रकार के बल्ब को आठ घंटे तक जलाने के लिए पर्याप्त बिजली का उत्पादन हो जाता है। यहां यह बताते चलें कि बिजली बनाने के लिए अलग से चरखा नहीं चलाना पड़ता बल्कि सूत कातने के साथ ही यह काम होता रहता है। इस तरह से कहा जाए तो ई-चरखा यहां के लोगों के लिए दोहरे फायदे का औजार बन गया है।

सूत कातने से आमदनी तो हो ही रही है साथ ही साथ इससे बनी बिजली से घर का अंधियारा भी दूर हो रहा है। राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में चरखा चलाने के काम में महिलाओं की भागीदारी ही ज्यादा है। कई महिलाएं तो ऐसी भी हैं जो बिजली जाने के बाद जरूरत पड़ने पर घर में रोशनी बिखेरने के लिए चरखा चलाना शुरू कर देती हैं।

इस खास चरखे को राजस्थान में एक सरकारी योजना के तहत लोगों को उपलब्ध कराया जा रहा है। इसकी कीमत साढ़े आठ हजार रुपए है। बिजली बनाने के लिए इसके साथ अलग से एक यंत्र जोड़ना पड़ता है। जिसकी कीमत पंद्रह सौ रुपए है। सरकारी योजना के तहत इसे खरीदने के लिए पचहत्तर प्रतिशत आर्थिक सहायता दी जा रही है। बाकी पचीस प्रतिशत पैसा खरीदार को लगाना पड़ता है जिसे किस्तों में अदा करने की व्यवस्था है।

वैकल्पिक ऊर्जा की राह अख्तियार करने के मामले में देश के मंदिर भी पीछे नहीं हैं। आंध्र प्रदेश का तिरुमला मंदिर का बड़ा नाम है। यहां हर रोज तकरीबन पांच हजार लोग आते हैं। अब इस मंदिर में खाना और प्रसाद बनाने के लिए सौर ऊर्जा पर आधारित तकनीक अपनाई जा रही है। इसके अलावा यहां सौर प्लेटों के जरिए भी बिजली की आपूर्ति की जा रही है। इन बदलावों की वजह से यहां से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी आई है। इस मंदिर में सौर ऊर्जा तकनीक की सफलता से प्रेरित होकर राज्य के अन्य मंदिरों ने भी ऐसी तकनीक को अपनाना शुरू कर दिया है।

चरखा बना आत्मनिर्भता का जरिया
चरखा बना आत्मनिर्भता का जरिया

राजस्थान के जयपुर के पास के कुछ गांवों में चरखा ही बिजली उत्पादन का जरिया बन गया है। महात्मा गांधी ने कभी चरखे को आत्मनिर्भरता का प्रतीक बताया था। आज गांधी के उसी संदेश को एक बार फिर राजस्थान के कुछ लोगों ने पूरे देश को देने की कोशिश की है।

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