आत्मनिर्भरता का प्रतीक बना चरखा

हिमांशु शेखर
 
भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कभी चरखे को आत्मनिर्भरता का प्रतीक बताया था। आज गांधी के उसी संदेश को एक बार फिर राजस्थान के एक गांव के लोगों ने चरखे के जरिए पूरे देश को देने की कोशिश की है। इस गांव का नाम है जटवारा।
आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाने वाले चरखे को ई-चरखा का नाम दिया गया है। इस चरखे को तमिलनाडु के एक गांधीवादी कार्यकर्ता एकंबर नाथ के अंबर चरखा में तकनीकी सुधार करके बनाया गया है। इस काम को अंजाम तक पहुंचाया है बंगलोर के इजीनियर आरएस हिरेमथ ने।
अभी तक जटवारा में ऐसे 75 चरखों के जरिए सूत कातने का काम हो रहा है। जब इस चरखे को दो घंटे चलाया जाता है तो इससे एक विशेष प्रकार के बल्ब को आठ घंटे तक जलाने के लिए पर्याप्त बिजली का उत्पादन हो जाता है। यहां यह बताते चलें कि बिजली बनाने के लिए अलग से चरखा नहीं चलाना पड़ता बल्कि सूत कातने के साथ ही यह काम होता रहता है। इस तरह से कहा जाए तो ई-चरखा यहां के लोगों के लिए दोहरे फायदे का औजार बन गया है।
जटवारा की एक दलित महिला हैं प्रेम। वे हर रोज इस चरखे के जरिए सूत कातने से वे पैंतीस से चालिस रुपए कमा लेती हैं। इसके अलावा प्रेम के पास आधा दर्जन बकरियां हैं जिनका दूध बेचकर वे और पैसे कमाती हैं। जाहिर है कि चरखे की आमदनी परिवार चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है लेकिन आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ा एक मजबूत कदम तो इसे माना ही जा सकता है।
सूत कातने से आमदनी तो हो ही रही है साथ ही साथ इससे बनी बिजली से घर का अंधियारा दूर हो रहा है। इस गांव में चरखा चलाने के काम में महिलाओं की भागीदारी ही ज्यादा है। इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि पुरुषों की व्यस्तता खेतों में ज्यादा होती है। इसलिए घर पर रहने वाली महिलाओं के लिए यह चरखा एक उपयोगी औजार बन गया है।
कई महिलाएं तो ऐसी भी हैं जो बिजली जाने के बाद जरूरत पड़ने पर घर में रोशनी बिखेरने के लिए चरखा चलाना शुरू कर देती हैं। ऐसी ही एक महिला हैं जटवारा की शांति देवी। रात में जब बिजली जाती है तो वे अंधियार दूर करने के लिए सूत कातना शुरू कर देती हैं। इसके अलावा राजस्थान के इस गांव में ट्रांजिस्टर और रेडियो चलाने के लिए भी इस चरखे की ऊर्जा का इस्तेमाल किया जा रहा है।
यह चरखा पर्यावरण को साफ सुथरा बनाए रखने में भी अपनी भूमिका रही है। यह कैसे हो रहा है, इसे बताया जटवारा के खादी एवं ग्रामोद्योग समिति के प्रबंधक बाबुलाल शर्मा। वे कहते हैं कि दो घंटे चरखा चलाने से जो ऊर्जा उत्पन्न होती है वह छह-सात घंटे तक एक बल्ब को जलाने के लिए पर्याप्त होती है। इस वजह से इस गांव की घरों में प्रदूषण फैलाने वाली किरोसीन लैंप का प्रयोग काफी कम गया है।
इस खास चरखे को राजस्थान खादी आयोग की एक योजना ‘स्फूर्ति’ के तहत लोगों को उपलब्ध कराया जा रहा है। इस चरखे को कुछ ही महीने पहले पायलट परियोजना के तहत वितरित किया गया लेकिन कम समय में ही इसकी लोकप्रियता काफी बढ़ गई। इस चरखे की कीमत साढ़े आठ हजार रुपए है। जबकि बिजली बनाने के लिए इसके साथ अलग से एक यंत्र जोड़ना पड़ता है। जिसकी कीमत पंद्रह सौ रुपए है। योजना के तहत इसे वहां के लोग पचीस फीसद रकम अदा करके खरीद रहे हैं। शेष रकम किस्तों में अदा करने की व्यवस्था है।
इस चरखे को देश भर में बड़े पैमाने पर गांवों में ले जाने की जरूरत है। ताकि ग्रामीण इलाकों में लोगों को स्वरोजगार के साथ-साथ अपनी ऊर्जा जरूरतों का कुछ हिस्सा तो कम से कम उपलब्ध हो सके। जटवारा के लोगों के लिए जब यह ई-चरखा ऊर्जा का एक वैकल्पिक जरिया होने के साथ-साथ आत्मनिर्भरता का भी एक अहम जरिया बन सकता है तो इतना तो तय है कि यह प्रयोग अन्य स्थानों के लिए लाभकारी साबित होगा।

4 thoughts on “आत्मनिर्भरता का प्रतीक बना चरखा

  1. Thanks for nice information.also give the detail that wherefrom it can be received and where will be its training.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *