आठ बनाम दो सौ अस्सी

हिमांशु शेखर

अमित देशमुख महाराष्ट्र विधान सभा में पहुंचने के लिए लातूर से चुनाव लड़ रहे हैं। वे विलास राव देशमुख के बेटे हैं। विलास राव देशमुख पिछले साल 26 नवंबर को मुंबई में हुए आतंकवादी हमले तक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे।

उन्हें उस समय भारी दबाव में हटाया गया था। फिर जब लोक सभा चुनावों के बाद कांग्रेस दुबारा सत्ता में आई तो विलास राव देशमुख को केंद्र में मंत्री बनाया गया है। अब राज्य में अपने लिए संभावना नहीं बनते हुए देख केंद्र में रहते हुए उन्होंने अपनी सीट लातूर से अपने बेटे अमित को चुनावी मैदान में उतार दिया।

विलास राव देशमुख को इस लातूर निर्वाचन क्षेत्र के लोगों ने पांच बार विधान सभा में अपनी नुमाइंदगी करने का मौका दिया है। इसलिए अमित अपनी जीत के प्रति आश्वस्त लगते हैं। यह बात वे मीडिया में आ रहे उनकी साक्षात्कारों से लगता है। पर उन्होंने अंग्रेजी के एक अखबार से बातचीत करते हुए एक ऐसी बात कही है जिस पर चर्चा बेहद जरूरी है। उनसे राजनीति में हावी हो रहे परिवारवाद पर सवाल पूछा गया था।

इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि यह अस्वाभाविक नहीं है और कांग्रेस ने राज्य के 288 सीटों में से आठ सीटों के लिए ही नेता पुत्र या नेता पुत्रियों को उम्मीदवार बनाया है। उनके मुताबिक इसमें कोई बुराई नहीं है। वे कहते हैं कि राजनीति में सबसे बड़ी चीज जीतने की क्षमता है और इसी वजह से ऐसे लोगों को टिकट दिया जाता है।

अमित की इन दोनों बातों पर चर्चा बेहद जरूरी है। क्योंकि उन्होंने जो दो बातें कही हैं, वे परिवारवाद की राजनीति की रक्षा करने की सियासत का हिस्सा है। पहली बात उन्होंने कही कि नेता पुत्र और नेता पुत्रियों को बहुत कम संख्या में टिकट दिए जा रहे हैं और इसे वे स्वाभाविक मानते हैं।

अमित का राजनीतिक अनुभव कम है। हालांकि, वे दावा करते हैं कि अपने पिता के चुनाव प्रचार के साथ-साथ लातूर के युवा कांग्रेस का काम भी वे पिछले कई साल से देखते रहे हैं। लेकिन उनकी बातों से उनकी राजनीतिक परिपक्वता नहीं झलकती है।

दरअसल, राजनीति आंकड़ों से नहीं चलती। यहां मामला 280 बनाम आठ का नहीं है। ऐसा कहना तो कुछ इसी तरह की बात हो गई है जैसे कोई चोर ये कहे कि आपकी पार्टी में तो सैंकड़ों भ्रष्ट लोग हैं लेकिन हमारी पार्टी में तो एक दर्जन ही हैं। इसलिए यह सही और स्वाभाविक है।

अमित को यह समझना चाहिए कि जो गलत है सो है। परिवारवाद को अगर लोकतंत्र के समक्ष एक गंभीर चुनौती माना जा रहा है तो इसकी यह वजह नहीं है कि सारे नेता ही परिवारतंत्र से आ रहे हैं। बल्कि, बड़े नेता या यों कहें कि सत्ता का संचालन करने वाले नेता परिवारवाद की राजनीति से निकल कर आ रहे हैं।

परिवारवाद से निकल कर आने वाले नेताओं की संख्या हमेशा से ही कम रही है। पर इनका रुतबा इन्हें सामान्य नेताओं से अलग कर देता है। नेता पुत्र या नेता पुत्री अगर पहली बार निर्वाचित होते हैं तो भी इनका राजनीतिक रसूख इस तरह का होता है कि इन्हें मंत्रीमंडल में जगह मिल जाती है। अगर मंत्रीमंडल में जगह नहीं भी मिले तो नीतियों के निर्धारण में इनका काफी दखल होता है और इनकी बात को बहुत अहमियत दी जाती है।

परिवारवाद की राजनीति करने वाले लोगों में से ही कोई सत्ता के शीर्ष पर बैठ जाता है। इसके लिए सामान्य नेता तो खुद को नेताओं का नेता निर्वाचित करवाने का एक जरिया मात्र बनकर रह जाते हैं। परिवारवाद की राजनीति करने वाले नेताओं की कम संख्या होने की वजह से सियासी परिवारवाद को सही नहीं ठहराया जा सकता है। इसलिए अमित को परिवारवाद की राजनीति की रक्षा के लिए कुछ और नए तर्क ढूंढने चाहिए। इस तरह की खोखली तर्कों से राजनीति में बढ़ते परिवारवाद की रक्षा नहीं की जा सकती है।

अमित ने परिवारवाद को जीतने की क्षमता से भी जोड़ा है। उन्हें यह लगता है कि नेता पुत्र और नेता पुत्रियों में जीतने की क्षमता सामान्य नेताओं के मुकाबले कहीं ज्यादा होती है। संभव है कि उनकी यह बात सही हो। पर क्या आज इस सवाल पर विचार नहीं किया जाना चाहिए कि आखिर जीत की कीमत क्या हो? क्या किसी भी कीमत पर जीत हासिल करने की प्रवृत्ति एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की सेहत के लिए सही है। अगर जीतने की क्षमता ही टिकट देने का पैमाना बन जाए तो ऐसी हालत में तो राजनीति के अपराधिकरण को भा गलत नहीं कहा जा सकता है।

दरअसल, एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों की आस्था बनी रही, इसके लिए बेहद जरूरी है कि कहीं न कहीं जीतने की क्षमता को लेकर कोई सीमा रेखा तय हो। दलों को तो यह तय करना ही चाहिए कि जीत किस कीमत पर चाहिए?

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