आगे बढ़ाना होगा उनके काम को

हिमांशु शेखर

प्रभाष जोशी चले गए। उनके जाने के बाद हर तरफ से यही आवाज आई कि उनका जाना एक युग का अंत हो जाना है। उनके जाने से जो शून्य उभरा है, उसे भरना असंभव सरीखा है। नामी पत्रकारों से लेकर नवोदित पत्रकारों और पत्रकारिता के छात्रों ने भी उन्हें अपने-अपने तरह से याद किया। अखबारों में चर्चा हुई। कुछ पत्रिकाओं ने प्रभाष जी पर विशेषांक निकालने की भी घोषणा कर दी है। ब्लाॅग जगत में प्रभाष जी के जाने पर सबसे ज्यादा चर्चा हुई। 6 नवंबर की सुबह प्रभाष जी के वसुंधरा वाले घर पर और फिर उसी दिन गांधी शांति प्रतिष्ठान में बड़ी संख्या में पत्रकार मौजूद थे। आने वाले लोगों में से ज्यादातर के मन में प्रभाष जी से जुड़ी कोई न कोई याद जरूर थी। लोगों ने प्रभाष जी की पत्रकारिता को लेकर जमकर बातें कीं।

जितने लोग और जिस तरह के लोग इन दोनों जगहों पर मौजूद थे, उसे देखते हुए तो यह माना जाना चाहिए कि प्रभाष जी जिन कामों को पूरा नहीं कर पाए, वह पूरा हो जाएगा। इन दोनों जगहों पर नहीं मौजूद रहने वाले बहुत सारे लोगों ने ब्लाग या और किसी माध्यम के जरिए प्रभाष जी को याद किया। सही मायने में कहें तो यही परीक्षा की घड़ी है। प्रभाष जी के शिष्य होने की बात तो बहुत सारे लोग कर रहे हैं। हर कोई उनकी बड़ाई कर रहा है। ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो कह रहे हैं कि प्रभाष जोशी ही उन्हें पत्रकारिता में लाए और आज वे जो कुछ भी हैं उनमें बड़ा योगदान प्रभाष जी का है। पर सवाल यह उठता है कि क्या ये सभी लोग प्रभाष जी के उन कामों को आगे बढ़ा पाएंगे, जिसे पूरा करने से पहले प्रभाष जी ने स्थूल शरीर को त्याग दिया।

यह बात तो जगजाहिर है कि वे खबरों और विज्ञापन को घालमेल के खिलाफ अभियान चला रहे थे। इसके अलावा भी वे कुछ काम और करना चाह रहे थे। इस बारे में 4 नवंबर को उन्होंने केएन गोविंदाचार्य से चर्चा की थी। गोविंदाचार्य और प्रभाष जोशी बनारस से लखनऊ एक ही कार से आए थे और हिंद स्वराज पर आयोजित कार्यक्रम में दोनों ने भाषण दिया था। गोविंदाचार्य ने बताया कि उस सात घंटे की यात्रा में बहुत सी बातें हुईं और प्रभाष जी ने बताया कि और क्या-क्या करना उनकी योजना में है। पैसे लेकर खबर छापने के खिलाफ अपनी मुहिम को अंजाम तक पहुंचाने की योजना के अलावा उन्होंने गोविंद जी को बताया कि वे हिंद स्वराज पर एक किताब लिखना चाहते हैं। इसके अलावा उन्होंने बताया कि देशज शब्दों को भी हिंदी की शब्दकोश में जगह मिलना चाहिए और देशज शब्दों का भी एक शब्दकोश तैयार होना चाहिए। साथ ही वे लोक जीवन और लोक संस्कृति पर भी कुछ काम करना चाहते थे।

उनके दिमाग में अपनी किताबों को लेकर क्या विचार थे, वे तो उनके साथ ही चले गए लेकिन उनके दूसरों कामों को तो आगे बढ़ाया ही जा सकता है। उनके शिष्य होने का दावा करने वाले लोग या उनके प्रति श्रद्धा रखने वाले लोगों को देशज शब्दों की शब्दावली तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। प्रभाष जी के लिए इससे बढ़कर श्रद्धांजलि और क्या होगी कि उनके कामों को आगे बढ़ाया जाए। उनके जाने के बाद कुछ दिनों तक आंसू बहाया जाए और बड़े ही मार्मिक संस्मरण लिखे जाएं लेकिन कुछ ही दिनों में उनके अधूरे कामों को भूला दिया जाए तो यह तो उनके साथ एक प्रकार का छल ही होगा।

प्रभाष जी के प्रति अपने मन में श्रद्धा रखने वाले लोगों को उनके द्वारा स्थापित मूल्यों की रक्षा की दिशा में सोचना और कुछ करना चाहिए। ऐसा नहीं करना प्रभाष जी के साथ न्याय नहीं होगा। उन्होंने पत्रकारिता जगत को जो दिया है, उसे खो देना सही नहीं है। प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर प्रभाष जी से दीक्षा पाने वाले पत्रकारों की एक बड़ी संख्या है और इस बड़ी जमात पर प्रभाष जी द्वारा शुरू की गई लड़ाई को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है। पैसे लेकर खबर छापने के खिलाफ जो मुहिम उन्होंने शुरू की थी, उसे एक अंजाम तक पहुंचाने की जिम्मेदारी इसी जमात पर है। बजाहिर, सबसे ज्यादा जिम्मेदारी उन लोगों पर है, जो उनके सबसे करीब थे और उनकी इस लड़ाई में कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे थे।

सितंबर के मध्य में जब प्रभाष जी से मेरी आखिरी मुलाकात उन्हीं के वसुंधरा वाले घर पर हुई थी तो उन्होंने विस्तार से अपनी इस लड़ाई के बारे में बताया था। उन्होंने बताया था कि पैसे लेकर खबर छापने की खबरिया संस्थानों की कुप्रथा के खिलाफ वे पांच स्तर पर अपनी लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं। पहला है प्रेस आयोग के सामने सारी बातों को रखना और प्रेस आयोग को जांच के लिए कहना। उन्होंने बताया था कि इस मामले में प्रेस आयोग ने एक दो सदस्यीय समिति गठित कर दी है। इस दो सदस्यीय समिति को यह काम दिया गया है कि वह विज्ञापनों को खबर बनाकर छापने संबंधी शिकायत पर सारे साक्ष्य एकत्रित करे। उन्होंने बताया था कि जब यह समिति जरूरी साक्ष्य एकत्रित कर लेगी तो प्रेस आयोग एक बड़ी समिति गठित करेगी। यह बड़ी समिति इस पूरे मामलेे की जांच करेगी।

प्रभाष जोशी इस बात को लेकर चुनाव आयोग के पास भी गए थे। वहां उन्हें बताया गया कि आयोग प्रेस के खिलाफ तो कोई कार्रवाई नहीं कर सकता लेकिन वह प्रत्याशियों के चुनावी खर्च की पड़ताल कर सकता है। प्रभाष जोशी ने कहा था कि अगर खबर छपवाने के बदले में दिए गए पैसे को प्रत्याशियों के चुनावी खर्च से जोड़ दिया जाए तो इनका खर्च तय सीमा को पार कर जाएगा। ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग इन प्रत्याशियों के खिलाफ कार्रवाई कर सकेगा।

प्रभाष जोशी इस बात को मानते थे कि पैसे लेकर खबर छापने जैसे प्रेस के आचरण पर नियंत्रण के लिए देश में जरूरी कानून भी नहीं है। इसका फायदा भी कई मीडिया संस्थान उठा रहे हैं। उन्हें लगता है कि कानूनी लचरता की वजह से वे कुछ भी करें लेकिन उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। इसलिए प्रभाष जोशी कानून में फेरबदल के लिए भी प्रयासरत थे। उन्होंने बताया था कि मीडिया द्वारा पैसे लेकर खबर छापना एक राजनीतिक मामला है और इसमें राजनीतिक लोगों को भागीदारी तो सुनिश्चित करनी होगी। इसके लिए वे कई सांसदों के संपर्क में थे और वे इस बात के लिए प्रयासरत थे कि कुछ नेता किसी सार्वजनिक मंच पर आकर यह कहें कि चुनाव में उनसे खबर छापने के बदले पैसे की मांग की गई। उन्होंने कहा था कि इतना हो जाने के बाद वे सांसदों से इस मसले को संसद में उठाने का अनुरोध करेंगे और कानून में फेरबदल करवाने की कोशिश करेंगे। वे मानते थे कि बगैर कानूनी बदलाव किए प्रेस की इस अराजक रवैये पर काबू नहीं पाया जा सकता है। इतना होने के बाद वे इस मामले को सुप्रीम कोर्ट लेकर जाने की तैयारी कर रहे थे।

इसके अलावा पैसे लेकर खबर छापने के खिलाफ वे जन आंदोलन की जमीन तैयार करने में भी जुटे हुए थे। इसके लिए वे खूब भागदौड़ कर रहे थे। इसी भागदौड़ को उनकी सेहत अचानक बिगड़ने की एक बड़ी वजह बताया जा रहा है। वे अलग-अलग जगहों पर जा रहे थे और लोगों से मिल रहे थे। वे दिल्ली समेत राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और झारखंड में कई भाषण इस मसले पर जनजागरण के लिए दे चुके थे। वे कई पत्रकारिता शिक्षण संस्थानों में भी गए थे और इस पूरे गोरखधंधे को उन्होंने पत्रकारिता में आने वाले नए विद्यार्थियों को बताया था। अपने अभियान के प्रति लोगों से मिल रही प्रतिक्रिया से वे बेहद उत्साहित थे। उन्हें यह बात और भी अच्छी लग रही थी कि उन्हें नई पीढ़ी की तरफ से सबसे ज्यादा समर्थन मिल रहा है। उन्होंने कहा था कि माहौल तो ऐसा बनता जा रहा है कि पाठक खुद अखबारों के खिलाफ होते जा रहे हैं। प्रभाष जोशी यहीं से एक आंदोलन की शुरुआत की संभावना को देख रहे थे। एक ऐसा आंदोलन जिसमें खुद पाठक ही अपने अखबार के खिलाफ होगा।

पर दुर्भाग्य से प्रभाष जी इस आंदोलन को शुरू होने से पहले ही चले गए। अब इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उन लोगों पर है जो खुद को उनकी परंपरा से जोड़ कर देखते हैं। इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने की जिम्मेदारी उन लोगों की भी है जो प्रभाष जोशी के जीवन काल में उनकी इस लड़ाई में उनके साथ थे। जिन लोगांे से मिल रही प्रतिक्रिया से प्रभाष जोशी बेहद उत्साहित थे उन लोगों को आगे आकर प्रभाष जी की मुहिम को चलाना होगा और पैसे लेकर खबर छापने की कुप्रथा को खत्म करना होगा। अच्छी बात यह है कि इस लड़ाई की जमीन और रास्ता प्रभाष जी खुद तैयार करके गए हैं। इसे अंजाम तक पहुंचाने के लिए बस साहस करने की जरूरत है। ऐसा करके ही प्रभाष जी को सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकती है।

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