अभिव्यक्ति पर सियासी हमला

हिमांशु शेखर

बीते हफ्ते आईबीएन लोकमत के मुंबई स्थिति दफ्तर पर शिव सैनिकों ने हमला कर दिया। वहां पुरुष पत्रकारों के साथ-साथ महिलाकर्मियों से भी शिव सेना के शोहदों ने बदसलूकी की। इसके अलावा कार्यालय के गैर पत्रकारों को भी नहीं बख्शा गया। हद तो यह है कि आईबीएन लोकमत के प्रबंध संपादक निखिल वागले पर भी शिव सैनिकों ने हाथ उठाए। ये बातें इस चैनल को चलाने वाले लोग नहीं कह रहे हैं बल्कि टेलीविजन के जरिए पूरे देश ने इसे देखा और अभी भी इस पूरी घटना की रिकार्डिंग इस चैनल के पास हैं।

ये पहला मामला नहीं है जब महाराष्ट्र में प्रेस पर हमला किया गया। इससे पहले भी वहां प्रेस पर हमले होते रहे हैं। लोकसत्ता के संपादक कुमार केतकर के घर पर पत्थरबाजी पिछले ही साल हुई थी। इसके अलावा मुंबई में स्टार और जी के दफ्तर पर भी हमला हो चुका है। ऐसे हमले जब भी होते हैं तो सरकार रस्मी तौर पर यह कहती है कि दोषियों को नहीं बख्शा जाएगा। इस बार भी ऐसा ही होता दिख रहा है। हालांकि, राज्य के मुख्यमंत्री अशोक चव्हान ने हमले के बाद जरूर बार-बार यह भरोसा दिलाया कि मेरा यकीन कीजिए, हम दोषियों को किसी भी सूरत में नहीं बख्शेंगे। पर अभी तक उनके दावे खोखले ही मालूम पड़ रहे हैं।

ऐसा इसलिए कहा जा सकता है कि सिर्फ साधारण कार्यकर्ताओं को पकडऩे से इस तरह के हमलों को नहीं रोका जा सकता है। सरकार को इन हमलों को निर्देशित करने वाले लोगों को पकडऩा चाहिए। इस हमले के बाद शिव सेना सांसद संजय राउत ने इसे सही ठहराया। पर उनके खिलाफ अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। शिव सेना के लोगों का कहना है कि उनके नेता बाल ठाकरे के खिलाफ कोई बोलेगा तो राज्य का मराठी मानुष जग जाएगा और वह ऐसे हमले करेगा।

पिछले दिनों जब सचिन तेंदुलकर पर बाल ठाकरे ने शिव सेना के मुखपत्र सामना में खुला पत्र लिखकर निशाना साधा तो उनका देश भर में बड़ा विरोध हुआ। आईबीएन लोकमत ने भी उनका विरोध किया था। शिव सैनिक इस बात पर भड़क उठे और उन्होंने चैनल के दफ्तर पर हमला कर दिया।

इस हमले को सही ठहराने के लिए शिव सेना नए-नए तर्क गढ़ रही है। इसी क्रम में पार्टी के मुखपत्र सामना में सचिन की आलोचना को विस्ता दिया गया है। कहा गया है कि सचिन से बेहतर मराठी तो सुनील गावस्कर थे। पार्टी मानती है कि वे मराठी क्रिकेटरों को कम से कम एक टैस्ट खेलाकर ही उसे टेस्ट कैप दे देते थे। अगर सचमुच गावस्कर ने ऐसा किया तो क्या इसे सही ठहराया जा सकता है? बिल्कुल नहीं।

वैसे भी गावस्कर को किसी शिव सैनिक से सर्टिफिकेट लेने की जरूरत है। गावस्कर को देश-दुनिया इसलिए नहीं जानती कि वे मराठी क्रिकेटरों को टेस्ट पदार्पण करने का मौका देते थे बल्कि इसलिए जानती है कि वे बहुत अच्छी बल्लेबाजी करते थे।

बहरहाल, आईबीएन पर हुए हमले को शिव सेना मराठियों के गुस्से की सहज अभिव्यक्ति बता रही है। शिव सेना का कहना है कि जो भी बाल ठाकरे के खिलाफ बोलेगा उसके साथ यही होगा। इस बात को स्वीकार करने में तो किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि सचिन के समर्थकों की संख्या बाल ठाकरे के समर्थकों की संख्या से कई गुनी है।

अगर सचिन के समर्थक भी शिव सैनिकों के गुंडों की भाषा में बात करने लगें तो फिर क्या होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। जिस मराठी मानुष के हमदर्द होने का राग ठाकरे अलापते हैं वही मराठी मानुष उनकी पार्टी को बार-बार चुनावों में खारिज कर रहा है। इससे साफ है कि महाराष्टï्र की जनता उनके और उनकी विचारधारा के साथ नहीं है। इसके बावजूद अगर वे और उनकी पार्टी मराठी मानुष की नुमाइंदगी का दंभ भरते हैं तो उनकी राजनीतिक ताकत का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

दरअसल, शिव सेना अपने आप को कानून-व्यवस्था से ऊपर मानती है। यही वजह है कि वे बात-बात पर गुंडई करने पर उतारू हो जाते हैं। शिव सेना की गुंडई को आगे बढ़ाने में महाराष्टï्र की सत्ता व्यवस्था ने परोक्ष तौर पर सहयोग ही किया है। अगर ऐसा नहीं होता  तो आखिर क्या वजह थी कि आईबीएन के दफ्तर पर हमला हो रहा था और चैनल की तरफ से बार-बार पुलिस को सूचना दिए जाने के बावजूद पुलिस काफी देर से वहां पहुंची।

इस हमले को सिर्फ आईबीएन के दायरे में रखकर नहीं देखा जाना चाहिए। क्योंकि मुंबई में ही दूसरे संस्थानों पर भी हमले हुए हैं। पिछले कुछ महीने में देश के दूसरे हिस्सों में मीडिया संस्थानों और मीडियाकर्मियों पर हमले हुए हैं लेकिन दोषियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

प्रेस पर होते हमलों के मामले में पुलिस और सत्ता व्यवस्था के रवैये को देखते हुए तो यही लगता है कि राजनीतिक दलों में प्रेस के दमन को लेकर एक आम सहमति बन गई है। ऐसा इसलिए भी लगता है कि प्रेस पर हो रहे हमलों को लेकर सत्ता और व्यवस्था सामान्यत: अपना मुंह नहीं खोलती है। दरअसल, सत्ता का चरित्र ऐसा हो गया है कि वह अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज का दमन करना चाहती है। प्रेस भी कई बार सत्ता विरोधी बात करती है।

कुछ समाचार संस्थानों का तो चरित्र ही व्यवस्था विरोधी है। यह बात सत्ताधीशों को पच नहीं रही है। इसलिए वे अपने खिलाफ आवाज उठाने वाले प्रेस का मुंह बंद करने के लिए किसी भी रास्ते को अपनाने से नहीं हिचकिचा रहे हैं। जाहिर है कि मुंबई में जो हमला हुआ है उसके लिए वहां की सत्ताधारी दल कांग्रेस और एनसीपी भी बराबर की जिम्मेवार है। क्योंकि बगैर सत्ता और व्यवस्था के सह के ऐसे कामों को अंजाम देकर बच निकलना असंभव सरीखा है।

यही वजह है कि ज्यादातर मामले में हमला करने वालों को तो कुछ दिनों के लिए पुलिस गिरफ्तार करती है लेकिन हमला करवाने वालों को नहीं पकड़ा जाता है। जिन्हें पकड़ा भी जाता है, उन्हें सबूत के अभाव में बाद में छोड़ दिया जाता है। प्रेस पर हो रहे हमले को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला माना जाना चाहिए। ऐसे हमलों का बढ़ते जाना एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की सेहत के लिए ठीक नहीं है। प्रेस पर हो रहे हमलों के खिलाफ पूरी मीडिया को एकजुट होना चाहिए।

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