अपनी सिर्फ जुबान

हिमांशु शेखर

मई, 2012. मुंबई में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक थी. आयोजन शुरू होने के ठीक पहले खबर आई कि लंबे समय बाद पार्टी में वापस बुलाए गए संजय जोशी ने कार्यकारिणी से इस्तीफा दे दिया है. कहा गया कि उस वक्त भाजपा के अध्यक्ष रहे नितिन गडकरी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के दबाव में संजय जोशी का इस्तीफा लिया. मोदी और जोशी के रिश्ते खराब हैं, यह बात जगजाहिर है. उस वक्त पार्टी प्रवक्ताओं ने कहा कि संजय जोशी पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और भले ही कार्यकारिणी से उन्होंने इस्तीफा दे दिया हो लेकिन पार्टी के लिए वे काम करते रहेंगे. लेकिन कुछ ही दिनों बाद संजय जोशी के पार्टी की सदस्यता से इस्तीफे की भी खबर आई. बातें हुईं कि नरेंद्र मोदी के दबाव में गडकरी ने संजय जोशी से इस्तीफा लिया क्योंकि कार्यकारिणी से हटने के बावजूद जोशी उत्तर प्रदेश में सक्रिय थे और नगर निगम के चुनावों से संबंधित कार्यों में लगे थे. तभी भाजपा की तरफ से एक औपचारिक प्रेस वार्ता की गई जिसे पार्टी प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर ने संबोधित किया. इसमें बताया गया कि जोशी ने खुद ही पार्टी से हटने की इच्छा जताई थी और पार्टी अध्यक्ष ने इसे स्वीकार कर लिया.

लेकिन इसके बाद जब कई पत्रकार इस फैसले का आधार जानने और इससे पार्टी पर पड़ने वाले असर की थाह लेने के लिए भाजपा प्रवक्ताओं से बात कर रहे थे तो हर कोई बहुत संभल कर बोल रहा था. ज्यादातर प्रवक्ता तो इस मामले पर कुछ बोलना ही नहीं चाह रहे थे. जब खुद तहलका ने पार्टी के एक प्रमुख प्रवक्ता से इस बारे में बातचीत करने की कोशिश की तो उन्होंने यह कहते हुए कन्नी काट ली कि इस बार मुझे छोड़ दीजिए. दो और प्रवक्ताओं ने भी कोई और बहाना बनाकर बातचीत करने से इनकार कर दिया. इन तीन प्रवक्ताओं में से एक ऐसे हैं जिनका कहना था कि वे ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत में सब कुछ बता सकते हैं लेकिन औपचारिक तौर पर कुछ नहीं बोलेंगे. बीते दिनों इस चुप्पी की वजह पूछे जाने पर पार्टी के एक प्रवक्ता कहते हैं, ‘संजय जोशी पार्टी के पुराने और वरिष्ठ नेता हैं. उनका प्रभाव भी काफी है. संघ में भी उनकी अच्छी पैठ है. अभी प्रमुख पदों पर दिखने वाले ज्यादातर नए लोग उनके तहत काम कर चुके हैं, इसलिए कोई भी इस मामले पर कुछ बोलना नहीं चाह रहा था.

कल को जोशी फिर पार्टी में अहम भूमिका में सक्रिय हो सकते हैं. ऐसे में कोई भी प्रवक्ता उन्हें नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाह रहा था.’ वे आगे कहते हैं, ‘इस मामले में चुप्पी की एक वजह यह भी थी कि खुद पार्टी के प्रमुख लोगों की तरफ से स्थिति स्पष्ट नहीं की गई थी. फिर बात पार्टी के एक और ताकतवर स्तंभ नरेंद्र मोदी से भी जुड़ी थी. इसलिए यह मामला प्रवक्ताओं के लिए चुनौतीपूर्ण बन गया था क्योंकि मीडिया के लोग प्रवक्ताओं से ही संपर्क करते थे और हमारे पास उन्हें टालते रहने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था.’ यह घटना बताती है कि किसी भी राजनीतिक दल के प्रवक्ताओं को किस-किस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. कई बार जब पार्टी बुरी तरह से किसी मामले में घिर जाती है और साफ-साफ यह दिखता है कि गलती पार्टी की है तो भी उन्हें मीडिया और लोगों के बीच जाकर पार्टी का बचाव करना होता है. भाजपा के एक प्रवक्ता बताते हैं, ‘शुरुआत में तो बहुत अच्छा लगता है जब आप टीवी पर दिखने लगते हैं. अखबार वाले आपके लगातार संपर्क में रहते हैं. लेकिन जाने-अनजाने थोड़ी-सी भी गड़बड़ी हुई तो सबसे आसान शिकार भी प्रवक्ता ही होता है. हर पल आगे कुआं और पीछे खाई वाली स्थिति होती है.’

तहलका ने कुछ राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों के प्रवक्ताओं से बात की. पता चला कि कई बार प्रवक्ता ऐसे मामले पर भी बोलने को मजबूर होता है जिसके बारे में उसकी निजी राय तो कुछ और होती है, लेकिन प्रवक्ता होने के नाते उसे हर जगह पार्टी लाइन का बचाव करना होता है.  इन प्रवक्ताओं के मुताबिक सबसे अधिक मुश्किल तब होती है जब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर आरोप लग रहे हों. अगर वे अपने नेताओं का बचाव करते हैं तो जनता में उनकी छवि खराब होती है और उन्हें प्रत्यक्ष न सही लेकिन परोक्ष तौर पर लोगों की गालियां सुननी पड़ती हैं. अगर वे अपने नेता का बचाव ठीक से न करें तो पार्टी में उनके भविष्य पर खतरा मंडराने लगता है.

हाल में कांग्रेस के प्रवक्ता उस वक्त मुश्किल में पड़ गए जब इंडिया अगेंस्ट करप्शन के अरविंद केजरीवाल ने सोनिया गांधी के दामाद और प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाडा के खिलाफ कई सबूतों के साथ आरोप लगाए. ऐसे में कांग्रेस प्रवक्ताओं के लिए मुश्किल पैदा हो गई. वे यह भी नहीं बोल सकते थे कि कानून अपना काम करेगा क्योंकि मामला सीधे-सीधे कांग्रेस के प्रथम परिवार से जुड़ा हुआ था. मुश्किल यह भी थी कि वे वाड्रा का बचाव भी नहीं कर सकते थे क्योंकि ऐसा करने पर पार्टी पर आरोप लगता कि वह भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है. ऐसे में दो-तीन दिन तक पार्टी प्रवक्ता असमंजस में रहे कि आखिर इस मामले में क्या बोलना है. सूत्रों के मुताबिक जब गांधी परिवार की तरफ से स्थिति साफ हुई तो फिर सभी प्रवक्ता एक सुर में रॉबर्ट वाड्रा का बचाव करने लगे. हालांकि इनमें से कई ऐसे थे जो निजी तौर पर वाड्रा के बचाव के पक्ष में नहीं थे, लेकिन न चाहते हुए भी उन्हें अपनी पार्टी के ‘प्रथम परिवार’ के बचाव में उतरना पड़ा.

कांग्रेस प्रवक्ताओं के बीच उस वक्त भी ऐसी ही स्थिति पैदा हो गई थी जब सोनिया गांधी इलाज कराने अचानक विदेश चली गई थीं. उनकी बीमारी के बारे में जितनी जानकारी सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध थी उससे अधिक जानकारी प्रवक्ताओं के पास भी नहीं थी. इसके बावजूद पत्रकार उनसे सोनिया गांधी की बीमारी के बारे में लगातार सवाल पूछते रहे.  शुरुआत में तो पार्टी के कई प्रवक्ताओं ने जवाब से बचने की कोशिश की, बाद में वे हर जगह यह जवाब देने लगे कि सोनिया गांधी की बीमारी उनका निजी मामला है और उनकी निजता का सम्मान करते हुए उनकी अच्छी सेहत की कामना की जानी चाहिए. सोनिया गांधी की बीमारी पर पार्टी प्रवक्ताओं या यों कहें कि पार्टी की ओर से स्पष्ट रुख नहीं अपनाए जाने की वजह से अफवाहों का बाजार गर्म होता रहा. दुनिया की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में शुमार की जाने वाली इकोनॉमिस्ट ने यह लिख दिया कि सोनिया गांधी जिस अस्पताल में हैं वहां कैंसर का इलाज होता है. इसके बाद तो दिल्ली में  जितने मुंह उतनी बातें होने लगीं.

लेकिन इस मसले पर लगातार सवालों का सामना करने वाले पार्टी प्रवक्ता चाहकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं कर सकते थे. उधर, भाजपा में भी तब ऐसी ही स्थिति पैदा हो गई जब अरविंद केजरीवाल के खुलासे के बाद मीडिया में नितिन गडकरी की कंपनी से संबंधित कई गड़बड़ियां सामने आईं. खुद पार्टी के राज्यसभा सांसद राम जेठमलानी ने गडकरी का इस्तीफा मांगा. गडकरी मीडिया से बात करने से बचते रहे. ऐसे में जब किसी भी पत्रकार ने पार्टी के किसी भी प्रवक्ता से इस बारे में बात करनी चाही तो एक वाक्य के आगे वे कुछ भी नहीं बोले. सभी प्रवक्ता यही कहते रहे कि खुद गडकरी जी ने जांच की बात कही है तो सरकार को जांच करा लेनी चाहिए. लेकिन जैसे ही उनसे पूछा जाता कि क्या गडकरी को एक और कार्यकाल मिलेगा तो उनकी जुबान पर ताला लग जाता था. सूत्रों के मुताबिक गडकरी को लेकर भी पार्टी के नेताओं में संजय जोशी वाले मामले जैसी मुश्किल थी. उनके मुताबिक कोई भी नेता गडकरी के खिलाफ बोलकर उन्हें नाराज नहीं करना चाहता था और कोई सीधे तौर पर उनका पक्ष इसलिए नहीं ले रहा था कि उसके मन में डर था कि अगर गडकरी की जगह कोई और आ गया तो फिर उसका क्या होगा.

जब गडकरी को दोबारा अध्यक्ष चुने जाने के वक्त घटनाक्रम तेजी से बदला तो भाजपा के प्रवक्ता फिर कुछ ऐसी ही स्थिति में फंस गए. पार्टी में सब कुछ ऐसे चल रहा था जैसे गडकरी का दोबारा अध्यक्ष बनना तय हो. अचानक उनकी कंपनियों पर आयकर विभाग का सर्वेक्षण हुआ और पार्टी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा की अगुवाई में एक धड़े ने गडकरी को दोबारा अध्यक्ष बनने के विरोध में मोर्चा खोल दिया. उस दिन पार्टी के जिस प्रवक्ता ने भी मीडिया से बात की उसकी हालत देखने लायक थी. किसी को भी नहीं पता था कि अगले दिन क्या होने वाला है और गडकरी को दूसरा कार्यकाल मिलेगा या नहीं. जब इन प्रवक्ताओं से यशवंत सिन्हा और दूसरे नेताओं की बगावत के बारे में पूछा जाता तो वे कोई टिप्पणी नहीं करते. दोनों नेताओं का नाम अध्यक्ष पद की दौड़ में था और कोई भी प्रवक्ता किसी एक को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकता था.

जब शीर्ष नेतृत्व और पार्टी की सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हों तो प्रवक्ता के लिए पार्टी का बचाव करना बेहद मुश्किल हो जाता है. कई बार प्रवक्ताओं को खुद लगता है कि वे जो बोल रहे हैं वह कुतर्क है और उसे जनता नहीं मानने वाली. इसके बावजूद उन्हें मीडिया में और लोगों के बीच जाकर बोलना होता है. बिहार के एक क्षेत्रीय पार्टी के एक प्रवक्ता बताते हैं, ‘हमारी पार्टी के जो अध्यक्ष हैं उनकी बातों से हम कई बार सहमत नहीं होते हैं. उनके आदेश पर पार्टी जो रास्ता तय करती है उससे भी कई बार असहमति रहती है. जब पार्टी के शीर्ष नेताओं पर कई तरह के आरोप लगते हैं तो भी मुझे निजी तौर पर लगता है कि भ्रष्टाचार करने वालों को नहीं बचाया जाना चाहिए. लेकिन पार्टी में रहते हुए और प्रवक्ता का दायित्व निभाते हुए न चाहते हुए भी उन मामलों पर जाकर पार्टी का और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का बचाव करना पड़ता है. इसे आप प्रवक्ता पद की मजबूरी कह सकते हैं.’ उनके मुताबिक एक प्रवक्ता के लिए सबसे मुश्किल घड़ी तब होती है जब तेजी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रम में पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अपना स्टैंड बार-बार बदल रहा हो. वे कहते हैं, ‘हमारे एक मित्र समाजवादी पार्टी में प्रवक्ता की भूमिका निभा रहे हैं.

पिछले साल हुए राष्ट्रपति चुनावों के दौरान उनके लिए पार्टी का बचाव करना मुश्किल हो गया. वे कई चैनलों में जाते रहते हैं. उन्होंने बताया कि पहले मुलायम सिंह यादव ने ममता बनर्जी के साथ मिलकर प्रणब मुखर्जी की उम्मीदवारी का विरोध किया और एपीजे अब्दुल कलाम की उम्मीदवारी का समर्थन किया. लेकिन 48 घंटे के अंदर  शीर्ष नेतृत्व ने अपना स्टैंड बदल लिया और प्रणब मुखर्जी को समर्थन देने का फैसला कर लिया. वे कह रहे थे कि उनके लिए चैनलवालों से लेकर अखबारवालों तक को जवाब देना मुश्किल पड़ रहा था.’ ऐसी स्थिति में प्रवक्ता को अगर बेशर्मी से पार्टी का बचाव करना है तो उसे मीडिया से ताने सुनने पड़ते हैं और अगर वह ठीक से बचाव नहीं कर पाए तो पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को यह लगता है कि यह तो प्रवक्ता बने रहने लायक ही नहीं है.

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