अनुसंधान से हितसंधान

हिमांशु शेखर

जब 1942 में काउंसिल ऑफ साइंटिफिक ऐंड इंडस्ट्रीयल रिसर्च (सीएसआईआर) की स्‍थापना हुई थी तब से ही यह कहा जाता रहा है कि यह संस्‍थान देश को शोध के मामले में एक नया मुकाम देगा. संस्‍थान ने अपनी वेबसाइट पर अपने लक्ष्य को इन शब्दों में व्यक्त किया है- औद्योगिक वैज्ञानिक शोध को एक नई ऊंचाई देना ताकि भारत के नागरिकों को आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक लाभ मिल सके.

पर इसके उलट विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत काम करने वाले देश के इस बेहद अहम शोध संस्‍थान में आज अनियमितताओं को बोलबाला है. संस्‍थान से जुड़े लोग इन अनियमितताओं के लिए मौजूदा महानिदेशक समीर ब्रह्मचारी को कसूरवार मानते हैं. ब्रह्मचारी पर नियमों की अनदेखी कर मनमर्जी से नियुक्‍ति करने और नियुक्‍ति में बंगाल के लोगों को खास प्राथमिकता देने जैसे कई आरोप लग रहे हैं. भारत के महालेखा नियंत्रक एवं परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट भी संस्‍थान के कामों में अनियमितता की पुष्‍टि करती है. माना जा रहा है कि यह रिपोर्ट मॉनसून सत्र में संसद में पेश की जाएगी. इस रिपोर्ट की एक प्रति और ब्रह्मचारी पर अनियमितता के आरोपों की पुष्‍टि करने वाले कई दस्तावेज हैं.

संस्‍थान की अहमियत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसके अध्यक्ष देश के प्रधानमंत्री और उपाध्यक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री होते हैं. हाल तक कपिल सिब्बल विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री रहे हैं. संस्‍थान के सूत्रों का दावा है कि ब्रह्मचारी की नियुक्‍ति में सिब्बल की अहम भूमिका थी इसलिए इन अनियमितताओं के लिए सिब्बल को भी बराबर को दोषी माना जाना चाहिए. एक तरफ तो सिब्बल को कांग्रेस नए संकटमोचक के तौर पर विकसित कर रही है और उन्हें हर समस्या को सुलझाने के काम में लगाया जा रहा है लेकिन दूसरी तरफ उन्हीं के मंत्रालय के तहत आने वाले देश के प्रमुख शोध संस्‍थान में गड़बड़ियां होती रहीं लेकिन उनकी तरफ से इस समस्या को सुलझाने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाए गए. संस्‍थान से जुड़े एक वैज्ञानिक बताते हैं, ‘सीएसआईआर के महानिदेशक के चयन के लिए जो समिति बनी थी उसने भावनगर के सेंट्रल साल्ट ऐंड मरीन रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक पुष्‍पितो घोष के नाम की सिफारिश की थी. उस समिति ने ब्रह्मचारी को दूसरे नंबर पर रखा था. पर औपचारिक नियुक्‍ति के पहले ही घोष ने अपनी नियुक्‍ति की खबर कुछ पत्रकारों को दे दी. इसी बात को आधार बनाकर सिब्बल ने घोष की नियुक्‍ति को निरस्त करवाकर ब्रह्मचारी को महानिदेशक बनाने का रास्ता साफ किया.’ इस तरह से ब्रह्मचारी को 12 नवंबर 2006 को सीएसआईआर का महानिदेशक बनाया गया.

यहीं संस्‍थान में बड़े स्तर पर गड़बड़ियों की शुरुआत और नियुक्‍ति में ब्रह्मचारी के गृह राज्य पश्‍चिम बंगाल के लोगों को वरीयता देने का काम शुरू हुआ. हालांकि, ब्रह्मचारी पर अनियमितताओं के आरोप उनके महानिदेशक बनने के पहले से भी लगते रहे हैं. सीएसआईआर के महानिदेशक बनने से पहले ब्रह्मचारी इस संस्‍था के तहत आने वाले देश भर के 37 लैबों में से एक इंस्टीट्यूट ऑफ जेनोमिक ऐंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) के निदेशक थे. ब्रह्मचारी 11 अगस्त 1997 को बतौर निदेशक आईजीआईबी में आए थे.

ब्रह्मचारी के कार्यकाल में ही सरकारी निजी भागीदारी मॉडल यानी पीपीपी के तहत 2004 में एक संस्‍थान शुरू किया गया. इस संस्‍थान का नाम दि सेंटर फॉर जीनोमिक एप्लिकेशंस (टीसीजीए) है. इस परियोजना में निजी भागीदार है कोलकाता का इंस्टीट्यूट ऑफ मॉल्‍यिकूलर मेडिसिन (आईएमएम). आईएमएम का स्वामित्व पुर्णेंदु चटर्जी की अगुवाई वाली कंपनी चटर्जी मैनेजमेंट सर्विसेज के पास है. टीसीजीए की शुरुआत दिल्ली के ओखला इलाके में एक किराये के मकान में हुई लेकिन इसका परिसर बनाने के लिए इसे मथुरा रोड पर 10.75 एकड़ जमीन दिया गया. इस संस्‍थान को शुरू करने का मकसद यह था कि जीनोमिक और जैव विविधता के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर का शोध हो सके और संबंधित क्षेत्रों में पेटेंट हासिल करने के मामले में तेजी आए. साथ ही देश के दूसरे विश्वविद्यालयों और शोध संस्‍थानों को संबंधित क्षेत्र में शोध में मदद मिल सके. आईजीआईबी और आईएमएम के बीच जिस सहमति पत्र पर दस्तखत हुआ उसके जरिए यह तय किया गया कि नए संस्‍थान का प्रबंधन‌ निजी हाथों में होगा लेकिन जमीन का बंदोबस्त आईजीआईबी करेगी. पीपीपी के तहत शुरू हुए संस्‍थान टीसीजीए में जब अनियमितता के आरोप लगे तो खर्चे की ऑडिटिंग का जिम्मा कैग को मिला.

कैग ने अपनी रिपोर्ट में यह बताया कि टीसीजीए की शुरुआत के लिए आईएमएम का चयन करने से पहले आईजीआईबी ने किसी दूसरे विकल्प पर विचार नहीं किया. कैग का यह भी कहना है कि सहमति पत्र में सरकारी हितों को ध्यान नहीं रखा गया और बौद्घिक संपदा अधिकार से होने वाली आमदनी के अलावा संस्‍‌थान की अन्य आमदनी में हिस्सेदारी को लेकर स्पष्टता नहीं है. कैग ने बताया कि मथुरा रोड की जमीन पर आईएमएम को नौ करोड़ रुपये की लागत से परिसर का निर्माण 2005 के जुलाई तक करना था. निर्माण के ‌लिए दिल्ली नगर निगम समेत अन्य सरकारी एजेंसियों से जरूरी मंजूरी लेने का जिम्मा आईजीआईबी और सीएसआईआर के पास था. पर ब्रह्मचारी की अगुवाई वाली आईजीआईबी ने मंजूरी लेने में देरी की और अभी तक यह परिसर तैयार नहीं हुआ. देरी होने से लागत नौ करोड़ रुपये से 146 फीसदी बढ़कर 22.22 करोड़ रुपये हो गई. कैग ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि अपना परिसर तैयार नहीं होने की वजह से ओखला में जिस किराये के मकान में टीसीजीए चल रहा है, उसे आईजीआईबी ने अनाप-शनाप ढंग से किराया दिया और इसके लिए सीएसआईआर से जरूरी मंजूरी नहीं ली.

इसके ‌अलावा शोध के लिए उपकरणों की खरीदारी में अनियमितता की बात भी कैग ने अपनी रिपोर्ट में की है. कैग ने यह भी कहा कि टीसीजीए में इस्तेमाल किए जा रहे सरकारी उपकरणों की देखरेख में भी लापरवाही बरती गई. कैग ने ऑडिटिंग के दौरान पाया कि टीसीजीए के दस्तावेजों में आमदनी समेत कई जानकारियां ठीक ढंग से दर्ज नहीं की गईं. इससे संस्‍थान की आमदनी का सही-सही हिसाब लगाना मुश्‍किल हो गया. कैग ने अपनी जांच में यह भी पाया कि राकेश सी पंड्या और अर्जुन सूर्या नाम के दो कर्मचारियों को इनकी सेवा के बदले 2004-05 में क्रमशः 16.67 लाख रुपये और 18.92 लाख रुपये दिए गए जबकि टीसीजीए के उपस्‍थिति रजिस्टर में इन दोनों कर्मचारियों का नाम ही नहीं दर्ज है. ऐसे कुछ और मामले भी कैग को मिले. इन सभी गड़बड़ियों के लिए ब्रह्मचारी को इसलिए जिम्मेदार माना जा सकता है क्योंकि टीसीजीए को नियंत्रित करने के लिए एक सलाहकार परिषद का गठन किया गया था. प्रावधान यह किया गया था कि आईजीआईबी का निदेशक इस परिषद का प्रमुख होगा. इस नाते ब्रह्मचारी इस परिषद के प्रमुख थे और सारी गड़बड़ियां उनकी अगुवाई में ही हुई.

इसके बावजूद ब्रह्मचारी कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ते हुए सीएसआईआर के महानिदेशक बन गए और उनके साथ-साथ गड़बड़ियां आईजीआईबी से चलकर सीएसआईआर तक आ गईं. सीएसआईआर से जुड़े दो वैज्ञानिकों ने बताया कि जब से ब्रह्मचारी सीएसआईआर में आए तब से उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर पश्‍चिम बंगाल के लोगों को नियुक्त करना शुरू कर दिया. इन वैज्ञानिकों का दावा है कि सीएसआईआर के कुल 37 लैबों में से ज्यादातर पर आज बंगाल के लोगों का कब्जा है. ऐसे कई दस्तावेजी सबूत मिले जो यह साबित करते हैं कि ब्रह्मचारी के राज में हुई नियुक्‍तियों में पश्‍चिम बंगाल के लोगों की संख्या ज्यादा रही. 22 जुलाई 2010 को ‘एच’ श्रेणी के तहत 17 वैज्ञानिकों की नियुक्‍ति की अधिसूचना जारी की गई. इनमें से दस वैज्ञानिक बंगाल के हैं. गौरतलब है कि वैज्ञानिकों की उच्चतम श्रेणी ‘एच’ होती है और इनकी संख्या काफी कम होती है. 31 दिसंबर 2011 को सेवानिवृत्त होने जा रहे ब्रह्मचारी पर एक आरोप यह भी है कि उन्होंने ‘एच’ श्रेणी के तहत कई वैज्ञानिकों को नियुक्त कर इस श्रेणी की गरिमा को कम किया. हंसी-मजाक में खुद को ब्रह्मा चारी कहने वाले ब्रह्मचारी के राज में निस्टैड्स में क्‍विकली हायर्ड सर्विसेज (क्यूएचएस) यानी ठेके पर 30 लोगों को नियुक्त किया गया. इनमें से भी 17 बंगाल के हैं.

ब्रह्मचारी पर लग रहे कई आरोपों में से एक यह भी है कि उन्होंने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले पार्थसार्थी बनर्जी को नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस टेक्नोलॉजी ऐंड डेवलपमेंट स्टडीज (निस्टैड्स) का निदेशक 2008 के मार्च में बनाया. जबकि इस पद के सबसे मजबूत दावेदार कोचीन विश्वविद्यालय के कुलपति रहे गनगन प्रताप को माना जा रहा था. पर बनर्जी को निस्टैड्स में लाने के लिए ब्रह्मचारी ने प्रसाद को नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस कम्युनिकेशंस ऐंड इन्फॉर्मेशन रिसोर्सेज (निस्केयर) का निदेशक बना दिया. मजेदार बात यह है कि प्रसाद ने निस्केयर के निदेशक पद के लिए आवेदन ही नहीं किया था. उन्होंने आवेदन निस्टैड्स के निदेशक पद के लिए किया था.

31 मार्च 2010 की तारीख में पश्‍चिम बंगाल पुलिस की एक चिट्ठी में बनर्जी के आपराधिक रिकॉर्ड के बारे में विस्तार से बताया गया है. इस पत्र के मुताबिक जब बनर्जी 11वीं के छात्र थे तब ही उन्हें 20 अप्रैल1970 को मारपीट करने और सरकारी संपत्‍ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. पुलिस के मुताबिक जेल से छूटने के बाद बनर्जी नक्सल राजनीति में सक्रिय हो गए. उस समय केंद्रीय रेल राज्य मंत्री रहे परिमल घोष की पत्नी और बेटे पर जान लेने के मकसद से हमला करने के आरोप में बनर्जी को 15 दिसंबर 1970 को एक बार फिर कोलकाता पुलिस ने गिरफ्तार किया. इस मामले में 26 जुलाई 1972 को बनर्जी को पांच साल कैद की सजा सुनाई गई. पर निस्टैड्स के निदेशक के तौर पर नियुक्‍ति के समय ब्रह्मचारी ने इन तथ्यों की अनदेखी की.

सलाहकारों की नियुक्‍ति के मामले में भी ब्रह्मचारी पर अनियमितता के आरोप लग रहे हैं. सीएसआईआर सूत्रों की मानें तो ये सलाहकार न ही कोई काम कर रहे हैं और न ही इनकी कोई जवाबदेही तय की गई है लेकिन ये मोटी पगार उठा रहे हैं. बताते चलें कि सीएसआईआर मुख्यालय में ब्रह्मचारी ने कई सलाहकारों को नियुक्त किया है. इन सलाहकारों में दो यश पाल कपूर और हिमाद्री शेखर मैती को एक लाख रुपये के मासिक पगार पर रखा गया. सीएसआईआर के वैज्ञानिकों का कहना है कि ये दोनों नियुक्‍ति नियमों को ताक पर रखकर किए गए. क्योंकि सीएसआईआर सामान्य आर्थिक नियमावली के नियम संख्या-176 के तहत दस लाख रुपये सालाना से ज्यादा पगार वाली नियुक्‍ति के लिए वित्त मंत्रालय से मंजूरी लेना अनिवार्य है लेकिन इन दोनों मामलों में अनुमति लेना जरूरी नहीं समझा गया.

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