अनशन से सियासत तक

हिमांशु शेखर

अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों द्वारा चलाए जा रहे अभियान के असमंजस की स्‍थिति में पहुंचकर राजनीतिक विकल्प का राग छेड़ने के बाद ज्यादातर लोग इस बात को लेकर सशंकित थे कि स्वामी रामदेव के अभियान को उत्साहजनक समर्थन मिलेगा. खुद स्वामी रामदेव की बातों से भी ऐसा ही लग रहा था. 9 अगस्त को रामलीला मैदान में अपना अभियान शुरू करने के एक दिन पहले मीडिया से बातचीत में स्वामी रामदेव बार-बार यह दोहरा रहे थे कि उनका अभियान किसी पार्टी या व्यक्‍ति के खिलाफ नहीं है बल्‍कि वे काला धन वापस लाने और कुछ संवैधानिक पदों पर होने वाली नियुक्‍ति प्रक्रिया में सुधार चाहते हैं. लेकिन यही स्वामी रामदेव तीन दिन के बाद यह नारा देने लगे कि कांग्रेस को हटाना है और देश को बचाना है. स्वामी रामदेव ने यह भी कह डाला कि 13 अगस्त से सरकार के 13वीं की शुरुआत हो गई है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि अपने अभियान की शुरुआत बेहद रक्षात्मक ढंग से करने वाले स्वामी रामदेव तीन दिनों में ही इतने आक्रामक कैसे हो गए?

जिस दिन रामदेव के अभियान की औपचारिक शुरुआत हुई उसी दिन केंद्रीय मंत्री हरीश रावत की तरफ से यह बयान आया कि सरकार बातचीत के लिए तैयार है. लेकिन हकीकत यह है कि सरकार के वरिष्ठ मंत्री स्वामी रामदेव से किसी भी तरह की बातचीत के पक्ष में नहीं थे. सरकार यह मानकर चल रही थी कि जो हश्र अन्ना हजारे के अभियान का हुआ है वही स्वामी रामदेव के अभियान के साथ भी होगा. इसी उत्साह में केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने यह तक कह डाला कि स्वामी रामदेव कौन हैं? उनसे पत्रकारों ने यह जानना चाहा था कि स्वामी रामदेव के अभियान पर सरकार का क्या रुख है. स्वामी रामदेव ने प्रधानमंत्री को जो पत्र लिखे उसका कोई जवाब सरकार की तरफ से नहीं दिया गया.

लोगों को यह लग रहा था कि कहीं स्वामी रामदेव के साथ वही न हो जो पिछले साल हुआ था. पिछले साल न सिर्फ स्वामी रामदेव पर पुलिसिया कार्रवाई हुई थी बल्‍कि उन्हें हरिद्वार में अपना अनशन कुछ उसी तरह से बेआबरु होकर तोड़ना पड़ा था जिस तरह से इस बार अन्ना हजारे और उनके सहयोगी अनशन खत्म करने को बाध्य हुए. लेकिन जानकारों की मानें तो स्वामी रामदेव ने अंदर ही अंदर अपनी तैयारी कर ली थी. पिछले साल केंद्र सरकार द्वारा बेईज्जत किए जाने और महिलाओं के पोशाक में रामलीला मैदान छोड़कर भागने वाले स्वामी रामदेव ने इस एक साल में ज्यादातर कांग्रेस विरोधी दलों से संपर्क साधा. उनके एक सहयोगी बताते हैं, ‘इन सभी मुलाकातों में उन्होंने राजनीतिक दलों से समर्थन मांगा लेकिन उन्होंने खुद इस बात पर कोई वादा नहीं किया कि वे कोई राजनीतिक दल नहीं बनाएंगे. इन मुलाकातों में ज्यादातर नेताओं ने काले धन के मुद्दे पर समर्थन का आश्वासन तो दिया लेकिन स्वामी रामदेव को यह नसीहत भी दी कि कोई राजनीतिक दल न बनाएं. लेकिन बाबा के मन से अलग राजनीतिक दल का मोह छूटा नहीं रहा था. पहले से योजना यह भी कि 9 अगस्त को अभियान शुरू होगा और 12 अगस्त को स्वामी रामदेव नई पार्टी की घोषणा करते हुए यह बताएंगे कि सभी लोकसभा सीटों पर वे अपने उम्मीदवार 2014 में उतारेंगे.’

तो फिर नई पार्टी की घोषणा क्यों नहीं हुई? जवाब में वे कहते हैं, ‘अन्ना हजारे के सहयोगियों से पूछिए कि उन्होंने राजनीतिक विकल्प की घोषणा करने में इतनी जल्दबाजी क्यों की. सच्चाई यह है कि वे पार्टी की घोषणा के मामले में स्वामी रामदेव से आगे रहना चाहते थे. वे अगर राजनीतिक विकल्प की बात बाद में करते तो लोग उन्हें यह कहते कि वे बाबा रामदेव के रास्ते पर चल रहे हैं. लेकिन अन्ना के सहयोगियों द्वारा राजनीतिक विकल्प की घोषणा पहले कर देने से यही संकट स्वामी रामदेव के सामने पैदा हो गया और उन्हें पार्टी बनाने की योजना टालनी पड़ी. उनके सामने अपने अभियान को सम्मानजनक स्तर पर ले जाने के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का समर्थन हासिल करने के अलावा कोई और विकल्प ही नहीं बचा.’

जानकारों के मुताबिक भाजपा समेत राजग के सहयोगी दल स्वामी रामदेव का खुला समर्थन के लिए तब तक तैयार नहीं थे जब तक बाबा यह वादा न कर दें कि वे कोई राजनीतिक दल नहीं बनाएंगे. जब सरकार की तरफ से स्वामी रामदेव को कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली और उन पर दबाव बढ़ता गया तो पहले उन्होंने तीन दिन के अपने अल्टीमेटम को एक दिन के लिए बढ़ाया. लेकिन फिर भी सरकार ने स्वामी रामदेव को भाव नहीं दिया. इसके बाद स्वामी रामदेव के विकल्प सीमित होते गए और 12 अगस्त की दोपहर में संघ के बड़े अधिकारी की उनसे मुलाकात हुई. इस मुलाकात में स्वामी रामदेव ने संघ के इस अधिकारी से यह आग्रह किया कि वे भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी से बात करें और उन्हें समर्थन के लिए तैयार करें. यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि स्वामी रामदेव के अभियान को संघ और उसकी सहयोगी संगठनों का समर्थन पिछले साल से ही है.

भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘संघ के अधिकारियों से भाजपा अध्यक्ष की हुई बातचीत के बाद 12 अगस्त की शाम को नितिन गडकरी और स्वामी रामदेव के बीच फोन पर बातचीत हुई. स्वामी रामदेव भाजपा समेत पूरे राजग का समर्थन चाह रहे थे. लेकिन गडकरी समर्थन से पहले यह आश्वासन चाह रहे थे कि रामदेव भविष्य में कोई पार्टी नहीं बनाएंगे. शुरुआत में स्वामी रामदेव की तरफ से यह कहा गया कि उनका अभियान कांग्रेस विरुद्ध और राजगपरस्त रहेगा. इस पर गडकरी ने यह कहा कि राजग के अन्य घटकों को तैयार करने तब तक आसान नहीं होगा जब तक आप राजनीतिक दल नहीं बनाने की बात पर राजी नहीं होते.’ वे कहते हैं, ‘रामदेव ने अंततः यह बात मान ली कि वे राजनीतिक दल नहीं बनाएंगे और उन्होंने गडकरी को राजग के अन्य घटकों को समर्थन के लिए तैयार करने के लिए कहा. गडकरी ने स्वामी रामदेव से यह कहा कि वे अगली सुबह तक अंतिम तौर पर कुछ बता पाएंगे.’

भाजपा के ये नेता कहते हैं, ‘इस बीच गडकरी ने पहले शरद यादव से बात की. इसके बाद गडकरी और शरद यादव ने राजग के अन्य घटक दलों से बातचीत की. समर्थन के लिए राजग के घटकों को तैयार करने में ज्यादा कठिनाई इसलिए भी नहीं हुई क्योंकि खुद स्वामी रामदेव इस बार रामलीला मैदान आने से पहले ज्यादातर दलों के प्रमुख से मिल चुके थे. गडकरी ने संसद के दोनों सदनों के नेता प्रतिपक्ष से बात की. न सिर्फ अगले दिन सहयोगियों के साथ स्वामी रामदेव के समर्थन में रामलीला मैदान जाने की रणनीति बनाई गई बल्‍कि इस मसले को संसद के दोनों सदनों में अगले दिन जोरशोर से उठाने की योजना भी बनाई गई. राजग से बाहर के अन्ना द्रमुक और बीजू जनता दल से भी बात की गई. खुद स्वामी रामदेव ने भी कई नेताओं से बातचीत की और दोहराया कि वे राजनीतिक दल नहीं बनाएंगे.’

जब सारी योजना बन गई तो 13 अगस्त की सुबह एक बार फिर गडकरी और स्वामी रामदेव के बीच फोन पर बातचीत हुई. इसके बाद से स्वामी रामदेव का सुर बदल गया और रामलीला मैदान से उन्होंने न सिर्फ कांग्रेस और केंद्र सरकार पर हमले किए बल्‍कि यह नारा भी दे डाला कि कांग्रेस हटाओ, देश बचाओ. इसके बाद पहले राजग के एक घटक जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्य स्वामी रामलीला मैदान पहुंचे. लोगों के लिए उनका आना आश्चर्यजनक नहीं था क्योंकि वे पहले भी कई दफा स्वामी रामदेव के साथ मंच साझा कर चुके हैं. लेकिन थोड़ी ही देर में स्वामी रामदेव के मंच पर नितिन गडकरी और शरद यादव समेत न सिर्फ भाजपा के कई नेता स्वामी रामदेव के मंच पर पहुंचे बल्‍कि बीजू जनता दल, शिव सेना, शिरोमणि अकाली दल और तेलगूदेशम पार्टी के प्रतिनिधि भी पहुंच गए. रामलीला मैदान से दूर संसद में अन्ना द्रमु्क ने भी काले धन के मुद्दे पर राजग का साथ देकर यह संदेश दिया कि वह भी स्वामी रामदेव के साथ है.

अक्सर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के आयोजनों में दिखने वाले समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव और बहुजन समाज पार्टी की मायावती ने भी स्वामी रामदेव का समर्थन किया. लेकिन कांग्रेस के महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने यह कहा कि स्वामी रामदेव का मुखौटा उतर गया है और इस राजनीतिक लड़ाई के लिए कांग्रेस पूरी तरह से तैयार है. लेकिन अब हर तरफ यही बात चल रही है कि राजग के साथ जुड़ने के बाद स्वामी रामदेव को फौरी राहत भले ही मिल गई हो लेकिन खुद उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा का भविष्य अनिश्चय से घिर गया है.

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