अखबारी मिलावट के खिलाफ मुहिम

हिमांशु शेखर

बीते आम चुनाव में जब कई अखबारों ने विज्ञापन को खबर के तौर पर परोसा तो उन अखबारों के प्रबंधन ने सोचा भी नहीं होगा कि उनके इस मिलावटी रवैये के खिलाफ एक मुहिम चल पड़ेगी। उन्होंने यह भी नहीं सोचा होगा कि इस मुहिम में उन्हीं के अखबारों में काम करने वाले लोग भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर शामिल हो जाएंगे। पर ऐसा हो गया है। इस मुहिम को नेतृत्व करने और गति देने का काम भी उसी शख्स ने किया है जिसके योगदान को हिंदी पत्रकारिता में बेहद अहम माना जाता है। जनसत्ता निकालकर हिंदी पत्रकारिता को एक नया तेवर देने का काम करने वाले प्रभाष जोशी खबरों और विज्ञापन के घालमेल के खिलाफ मुहिम छेड़े हुए हैं।

उन्होंने चुनाव के वक्त भी इस बात को बड़े जोर-शोर से उठाया था। प्रभाष जोशी ने इस मिलावट को उजागर करते हुए कुछ लेख भी लिखे। उस समय कई अखबारों के मालिक और उनका प्रबंधन यह सोच रहा था कि चुनाव बीतते ही यह बात खुद ब खुद समाप्त हो जाएगी और उनका खेल चलता रहेगा। कमोबेश यही सोच उन अखबारी संस्थानों में चोटी पर बैठे पत्रकारों की भी थी। ये वैसे पत्रकार हैं जिनकी उपयोगिता एक मालिक के लिए संपादक से ज्यादा एक प्रबंधक की है। पर प्रभाष जोशी चुप नहीं बैठे और वे पैसे लेकर खबर छापने की प्रवृत्ति को खत्म करने के लिए प्रतिबद्धता के साथ कई स्तरों पर काम कर रहे हैं। अब वे इस काम में अकेले नहीं है बल्कि सही मायने में कहा जाए तो उन्हें लोग मिलते जा रहे हैं और कारवां बनता जा रहा है। उनके साथ अब कई वरिष्ठ पत्रकार आ गए हैं। वहीं दूसरी तरफ पत्रकारिता में आ रही नई पौध भी इस मुहिम में उनके साथ खड़ी है।

विज्ञापन को खबर बनाकर छापने की कुप्रथा को खत्म करने के लिए वे पांच स्तर पर काम कर रहे हैं। इसमें सबसे पहला है प्रेस आयोग के सामने सारी बातों को रखना और प्रेस आयोग को जांच के लिए कहना। उन्होंने बाकायदा प्रेस आयोग से लिखित शिकायत की है। इस शिकायत का असर यह हुआ है कि प्रेस आयोग ने एक दो सदस्यीय समिति गठित कर दी है। इस दो सदस्यीय समिति को यह काम दिया गया है कि वह विज्ञापनों को खबर बनाकर छापने संबंधी शिकायत पर सारे साक्ष्य एकत्रित करे। प्रभाष जोशी कहते हैं कि हमारे पास जो भी साक्ष्य थे, हमने इस समिति को दे दिया है और हम इनकी मदद कर रहे हैं। जब यह समिति जरूरी साक्ष्य एकत्रित कर लेगी तो प्रेस आयोग एक बड़ी समिति गठित करेगी। यह बड़ी समिति इस पूरे मामलेे की जांच करेगी और जिन अखबारों के खिलाफ शिकायत आई है, उनके पक्ष को भी सुनेगी। इसके बाद यह समिति प्रेस आयोग को अपनी रपट देगी और इसके आधार पर पैसे लेकर खबर छापने वाले अखबारों पर आवश्यक कार्रवाई की सिफारिश की जाएगी।

प्रभाष जोशी इस बात को लेकर चुनाव आयोग के पास भी गए थे। चुनाव आयोग ने भी इस मसले को गंभीरता से लिया है। प्रभाष जोशी कहते हैं कि चुनाव आयोग में मुझे यह बताया गया कि वे प्रेस के खिलाफ तो कोई कार्रवाई नहीं कर सकते हैं लेकिन वे प्रत्याशियों के चुनाव खर्चे की पड़ताल कर सकते हैं। बताते चलें कि पैसे देकर खबर छपवाने का काम काले पैसे से किया गया। किसी भी प्रत्याशी ने अपने चुनाव खर्चे में खबर छापने के बदले में दिए गए पैसे को शामिल करके चुनाव आयोग को नहीं दिखाया। प्रभाष जोशी कहते हैं कि अगर खबर छपवाने के बदले में दिए गए पैसे को प्रत्याशियों के चुनावी खर्च से जोड़ दिया जाए तो इनका खर्च तय सीमा को पार कर जाएगा। ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग इन प्रत्याशियों के खिलाफ कार्रवाई कर सकेगी। चुनाव आयोग भी साक्ष्यों को एकत्रित करने के काम में लग गई है और इसके लिए वह कई लोगों का सहयोग ले रही है।

यह बात तय है कि पैसे देकर खबर छपवाने वाले कई प्रत्याशी अब संसद की शोभा बढ़ा रहे हैं। अगर चुनाव आयोग अपनी जांच में सफल रहा और उसने कुछ ऐसे सांसदों की खर्च तय सीमा से ज्यादा साबित कर दिया तो उनकी सांसदी खतरे में पड़ जाएगी। उन सांसदों के चुनाव रद्द होने की स्थिति भी आ सकती है। अगर दो-चार या यहां तक कि अगर एक सांसद का चुनाव भी इस वजह से रद्द हो जाए तो इसका बड़ा गहरा असर पड़ेगा। एक बार ऐसा हो जाने पर कई सांसद सकते में आ जाएंगे और उनके विपक्षी फिर उनके खिलाफ ऐसे मामलों को खुद ब खुद उजागर करके सामने लाएंगे।

बहरहाल, पैसे लेकर खबर छापने जैसे प्रेस के आचरण पर नियंत्रण के लिए देश में जरूरी कानून भी नहीं है। इसका फायदा भी कई मीडिया संस्थान उठा रहे हैं। उन्हें लगता है कि कानूनी लचरता की वजह से वे कुछ भी करें लेकिन उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। इस बात को प्रभाष जोशी अच्छी तरह से समझते हैं। यही वजह है कि वे कानून में फेरबदल के लिए भी प्रयासरत हैं। वे कहते हैं कि यह मीडिया द्वारा पैसे लेकर खबर छापना एक राजनीतिक मामला है और इसमें राजनीतिक लोगों को भागीदारी तो सुनिश्चित करनी होगी। यह पूछे जाने पर कि राजनीतिक लोगों की भागीदारी के लिए क्या कर रहे हैं, वे कहते हैं कि हमारी कई सांसदों से बात चल रही है। साथ ही हम वैसे नेताओं से भी बात कर रहे हैं जो पहले कभी सांसद रहे हैं या इस बार चुनाव हार गए हैं। प्रभाष जोशी कहते हैं कि हमारी कोशिश यह है कि ऐसे कुछ नेता किसी सार्वजनिक मंच पर आकर यह कहें कि चुनाव में उनसे खबर छापने के बदले पैसे की मांग की गई। अगर वे ऐसा कहेंगे तो इस बात की पुष्टि साफ तौर पर हो जाएगी।

हालांकि, कुछ नेताओं ने इस बात को स्वीकार किया है लेकिन अभी यह संख्या पर्याप्त नहीं है। प्रभाष जोशी खुलकर इस बात को स्वीकारने वाले कुछ नेताओं के नाम गिनाते हैं। लालजी टंडन, अतुल अंजान, मोहन सिंह और हरिमोहन धवन ने इस बात को स्वीकार किया है कि उनसे चुनाव के दौरान खबर छापने के लिए पैसे मांगे गए। प्रभाष जोशी की बातों से ऐसा लगता है कि आने वाले दिनों में यह सूची लंबी होगी और कई मौजूदा सांसद, पूर्व सांसद और हारेे हुए प्रत्याशी सार्वजनिक मंच पर यह बात स्वीकारेंगे कि चुनाव में खबर छापने के एवज में उनसे फलां-फलां अखबार ने इतने पैसे मांगे।

प्रभाष जोशी कहते हैं कि इतना हो जाने के बाद वे सांसदों से इस मसले को संसद में उठाने का अनुरोध करेंगे। वे कहते हैं कि सांसदों से उनकी बातचीत सकारात्मक हो रही है और कई सांसद इस मसले पर बेहद गंभीर हैं। संसद में अगर यह मसला उठा तो इसे उठाने वाले सांसद समेत इसे गलत मानने वाले सांसदों के जरिए कानून में फेरबदल की कोशिश करवाई जाएगी। क्योंकि बगैर कानूनी बदलाव किए प्रेस की इस अराजक रवैये पर काबू नहीं पाया जा सकता है।

प्रभाष जोशी कहते हैं कि जब पैसे लेकर खबर छापने के खिलाफ माहौल बन जाएगा तो वे इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में लेकर जाएंगे। संभव है कि वहां मीडिया संस्थान वाले लोग अपने बचाव के लिए आएं। वे कहते हैं कि अखबार के मालिक और प्रबंधक यह तर्क दे सकते हैं कि अखबार चलाने के लिए पैसे जरूरी हैं इसलिए उन्हें विज्ञापन इस तरह से छापना उनकी मजबूरी है। प्रभाष जोशी कहते हैं कि ऐसी स्थिति में अखबारों के लिए यह नियम बना दिया जाए कि वे ऐसे खबर की शक्ल में छापे गए विज्ञापन के साथ यह लिखें कि यह खबर नहीं है बल्कि विज्ञापन है और इसका अखबार के संपादकीय नीति से कोई लेना-देना नहीं हैं। ऐसा हो जाने पर स्वाभाविक तौर पर अखबारों की अराजकता रुकेगी और विज्ञापनों को पैसा लेकर खबर के तौर पर परोसने की प्रवृत्ति खत्म होगी। कहना न होगा कि पाठक अखबार खबर पढ़ने के लिए खरीदता है न कि विज्ञापन पढ़ने या देखने के लिए। प्रभाष जोशी कहते हैं कि अगर पाठक विज्ञापन के लिए ही अखबार खरीदता तो फिर खबरों की शक्ल में विज्ञापन छपवाए ही नहीं जाते।

खैर, इसके अलावा पैसे लेकर खबर छापने के खिलाफ माहौल बनाने के लिए भी प्रभाष जोशी सक्रिय हैं। वे अलग-अलग जगहों पर जा रहे हैं और लोगों से मिल रहे हैं। वे दिल्ली समेत राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और झारखंड जा चुके हैं। इन राज्यों में उन्होंने कुछ कार्यक्रमों में हिस्सा लिया है। इन कार्यक्रमों में उन्होंने लोगों के सामने इस गोरखधंधे को रखा है। वे कई पत्रकार संगठनों से मिल रहे हैं। पत्रकार संगठनों की बैठकों में इस मसले पर उनका भाषण करवाया गया है। इसके अलावा वे कई पत्रकारिता शिक्षण संस्थानों में भी जा रहे हैं। इन संस्थानों में भी वे पूरी बात पत्रकारिता में आने वाले नए विद्यार्थियों को बता रहे हैं।

इस जनसंपर्क से मिलने वाली प्रतिक्रिया से वे बहुत उत्साहित हैं। वे कहते हैं कि लोगों की तरफ से भरपूर समर्थन मिल रहा है। वे इस बात से और भी ज्यादा प्रसन्न हैं कि नई पीढ़ी की तरफ से सबसे ज्यादा समर्थन मिल रहा है और इस पीढ़ी में इस बात को लेकर गहरी पीड़ा है। वेे इसे एक अच्छा संकेत मानते हैं। इसके अलाव पत्रकार संगठनों से भी भरपूर सहयोग मिल रहा है। साथ ही साथ मीडिया संस्थानों में काम कर रहे लोग भी उनकी इस मुहिम के साथ जुड़ रहे हैं। वे कहते हैं कि कार्यक्रमों में कामकाजी पत्रकारों की बड़ी संख्या रह रही है। प्रभाष जोशी कहते हैं कि उनकी इस मुहिम में उन्हें प्रभात खबर और इसके कर्ताधर्ता हरिवंश से भरपूर सहयोग मिल रहा है। इसके अलावा वे भोपाल के माखन लाल चतुर्वेदी राष्टीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय का नाम भी लेते हैं। इस विश्वविद्यालय ने अपनी पत्रिका मीडिया मीमांसा का एक पूरा अंक इसी मसले पर निकाला और पूरे दिन की परिचर्चा इस मसले पर आयोजित की। आम पाठक की भागीदारी के सवाल पर वे कहते हैं कि माहौल तो ऐसा बनता जा रहा है कि पाठक खुद अखबारों के खिलाफ होते जा रहे हैं। प्रभाष जोशी यहीं से एक आंदोलन की शुरुआत की संभावना को देखते हैं। एक ऐसा आंदोलन जिसमें खुद पाठक ही अपने अखबार के खिलाफ होगा, अपने उसी अखबार के खिलाफ जिसके कर्ताधर्ता अपने हर कुकर्म को पाठकों की पसंद के नाम पर सही ठहराते हैं।

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