नेहरू: गांधी के ढोंगी उत्तराधिकारी

महात्मा गांधी के राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को जाना जाता है। आम धारणा यह बनती है कि नेहरू ने न सिर्फ महात्मा गांधी के विचारों को आगे बढ़ाने का काम किया होगा बल्कि उन्होंने उन कार्यों को भी पूरा करने की दिशा में अपनी पूरी कोशिश की होगी जिन्हें खुद गांधी नहीं पूरा कर पाए। लेकिन सच्चाई इसके उलट है। यह बात कोई और नहीं बल्कि कभी नेहरू के साथ एक टीम के तौर पर काम करने वाले जयप्रकाश नारायण ने 1978 में आई पुस्तक ‘गांधी टूडे’ की भूमिका में कही थी। जाहिर है कि अगर जेपी ने नेहरू के बारे में कुछ कहा है तो उसकी विश्वसनीयता को लेकर कोई संदेह नहीं होना चाहिए।

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मेक इन इंडिया की चुनौतियां

मेक इन इंडिया पहल सीधे-सीधे मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र से जुड़ी हुई है। इसके तहत पूरा जोर इस बात पर है कि देश में विनिर्माण बढ़ाया जाए। प्रधानमंत्री ने कई मौकों पर इस बारे में जो बातें बोली हैं, उससे लगता है कि वे इस क्षेत्र को देश के आर्थिक विकास को गति देने के साथ बेरोजगारी कम करने के लिए भी जरूरी मानते हैं। मेक इन इंडिया योजना शुरू करते वक्त प्रधानमंत्री ने जो बातें बोलीं, उससे एक बात यह भी निकलती है कि वे किसी भी तरह भारत में निवेश लाना चाहते हैं और इसके लिए कारोबारी घराने जिन जरूरी शर्तों को पूरा करने की बात करते हैं, उन्हें पूरा करने के लिए मोदी सरकार प्रतिबद्ध है। सरकार ने ऐसे 25 महत्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान की है जिनमें भारत अग्रणी बन सकता है।

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एससीओ सदस्यता बेहद अहम

जिन दिनों चीन के राष्ट्रपति शी चिनपिंग भारत की यात्रा पर आने वाले थे, उसके कुछ ही दिनों पहले यानी सितंबर के दूसरे हफ्ते में तजाकिस्तान के दुशांबे शहर में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। यह बैठक थी शांघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की। भारत के लिहाज से इस बैठक की अहमियत यह रही कि इस मंच की पूर्ण सदस्यता के लिए भारत का रास्ता साफ हो गया है। एससीओ की पूर्ण सदस्यता का भारत के लिए क्या मतलब है, इसे समझने से पहले एससीओ के बारे में कुछ बुनियादी बातों को जानना जरूरी है।

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गैरबराबरी का मारा, हिंदोस्तां हमारा

परंपरा के मुताबिक 15 अगस्त के दिन देश के प्रधानमंत्री लाल किले पर तिरंगा फहराते रहे हैं और सरकार की ओर से देश के विकास के लिए की जा रही कोशिशों और इस दिशा में आगे की योजना की रूपरेखा रखते रहे हैं। मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक नरेंद्र मोदी इस दिन के अपने भाषण के लिए खास तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में उनसे यह उम्मीद रखना गलत नहीं होगा कि देश की आजादी के इस 67 साल में जिस तरह से गैरबराबरी पूरे भारत में बढ़ी है, उसे दूर करने की दिशा में वे कोई ठोस योजना देश के सामने रखेंगे और आम लोगों से ‘अच्छे दिनों’ का किया हुआ चुनावी वायदा निभाने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाएंगे।

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किसानों के लिए मिलाजुला बजट

जब नरेंद्र मोदी की सरकार ने मई के आखिरी दिनों में राजकाज संभाला तो देश के कई अन्य तबकों की तरह किसानों ने भी इस सरकार से खासी उम्मीद लगा रखी थी। जब नरेंद्र मोदी की सरकार ने केंद्र की सत्ता संभाली उसके बाद किसानों के लिए एक और मुश्किल आ खड़ी हुई। यह मुश्किल है खराब माॅनसून से उपजे सूखे की आशंका की। हालांकि, इसका सरकार से कोई लेना-देना नहीं है लेकिन फिर भी इस पृष्ठभूमि में जब मोदी सरकार का पहला आम बजट देश के नए वित्त मंत्री अरुण जेटली पेश करने वाले थे तो किसानों को यह उम्मीद थी कि उनकी समस्याओं के समाधान की स्पष्ट चिंता और कोशिश नए सरकार के बजट में दिखेगी।

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मोदी सरकार का मैंनेजमेंट तंत्र

नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली नई सरकार कई तरह से अपने कामकाज को अलग दिखाने की कोशिश कर रही है। इन्हीं कोशिशों में एक कोशिश यह भी है कि सरकारी अधिकारियों को प्रोत्साहित करने के लिए वैसे लोगों को बुलाया जा रहा है जो अब तक निजी क्षेत्र की कंपनियों में मैनेजमेंट और प्रोत्साहन जैसे विषयों पर व्याख्यान देते रहे हैं। अब तक केंद्र सरकार के दो अलग-अलग मंत्रालयों ने चेतन भगत और शिव खेड़ा को बुलाकर अधिकारियों के प्रोत्साहन के लिए कार्यशाला का आयोजन किया है। चेतन भगत अंग्रेजी के जाने-माने लेखक हैं। शिव खेड़ा ने भी लोगों को प्रेरित करने वाली कुछ बेहद लोकप्रिय किताबें लिखी हैं और वे भी प्रेरक भाषण देने कई संस्थानों में जाते हैं।

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पेड न्यूजः सब दल एक समाना

2014 के लोकसभा चुनावों में पेड न्यूज की शिकायतों की अंतिम संख्या अभी चुनाव आयोग ने आधिकारिक तौर पर नहीं जाहिर की है लेकिन अनुमान है कि चुनावों के दौरान ऐसी शिकायतों की संख्या हजार से अधिक रही। चुनाव आयोग ने इस बारे में अंतिम आधिकारिक जानकारी चुनाव के आखिरी चरण के तकरीबन दस दिन पहले दी थी। इसके मुताबिक आयोग ने तब तक पेड न्यूज के 854 मामले दर्ज किए थे। इसमें सबसे अधिक 208 मामले आंध्र प्रदेश में दर्ज किए गए। वहीं महाराष्ट्र में ऐसे 118 मामले आयोग के सामने आए।

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पेड न्यूज का चुनावी पेंच

इस चुनावी मौसम में अगर कोई अखबारों को देखे और 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान इन्हीं अखबारों की प्रतियों को देखें तो उसे एकबारगी लग सकता है कि मीडिया को पेड न्यूज नाम का जो रोग लगा था, वह ठीक हो गया है। 2009 में पेड न्यूज का हाल यह था कि एक ही अखबार के एक ही पन्ने पर कई बार दो और कई बार तो दो से अधिक उम्मीदवारों की सुनिश्चित जीत वाली खबर प्रकाशित हो जाती थी। एक ही पन्ने पर प्रकाशित हो रही खबरों का फाॅन्ट भी अलग-अलग दिखता था। अगर इन पैमानों को आधार बनाकर कोई अभी के अखबारों को देखेगा तो उसे यह लग सकता है कि पेड न्यूज की बीमारी खत्म हो गई है।

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